सूबे की जनता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिये वे सभी दरवाजे बंद कर दिये हैं, जिनके सहारे श्री कुमार ने पिछले पांच सालों में विकास के बदले जनता को सड़क और शिक्षा के नामपर कामचलाऊ शिक्षकों की बहाली और विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग आदि का बहाना बनाते रहे। उन्होंने जनता से अपने काम की मजदूरी मांगी और जनता ने उन्हें भरपूर मजदूरी दी। कम से कम चुनाव परिणाम तो यही कहते हैं, भले चाहे एक सच्चाई यह क्यों न हो कि सूबे के सर्वण मीडिया और सवर्ण नौकरशाहों ने पक्षपात के सारे रिकार्ड तोड़े।
पाठकों को शायद याद होगा कि वर्ष 1995 मे राज्य में चुनाव हुए थे तब आज के लालू प्रसाद को ऐसा ही जनादेश मिला था, जैसा कि आज नीतीश कुमार को मिला है। एकदम क्लीन स्वीप वाला जनादेश। इससे भी पहले हम आपको बता दें कि जब पहली बार लालू प्रसाद को सत्ता मिली थी तो इस बंदे ने भी राज्य की सबसे बड़ी समस्या भूमि सुधार की समस्या को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई थी और एक राष्ट्रीय स्तरीय कांफ़्रेंस बुलाकर इस समस्या के निदान की बात सोची थी, फ़िर जब विरोध शुरु हुआ तो सूबे की भूमिहीन और शोषित जनता ने लालू में अपना विश्वास व्यक्त किया।
आज की परिस्थिति भी उस परिस्थिति से किसी भी दृष्टिकोण से अलग नहीं है। एक अंतर है और यह अंतर है आज के युवा पीढी की। इससे पहले कि हम आपको युवा पीढी के अंतर की बात करें, हम आपको बताते हैं कि किस प्रकार जो चीज लालू के लिये आज काल बन चुकी है, वही नीतीश कुमार के लिये वरदान कैसे बन गई। यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि जब लालू प्रसाद ने बतौर मुख्यमंत्री सूबे की गद्दी संभाली थी, उस समय इनकी पूरी राजनीति सामाजिक न्याय के इर्द-गिर्द हुआ करती थी। सामाजिक न्याय की परिभाषा में पहले तो केवल मंडल कमीशन के दायरे में आने वाली जातियां शामिल थीं, लेकिन वर्ष 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद मुसलमान भी इसमें शामिल हो गये। पहली बार मुसलमानों को भी अपने वोट की ताकत का अहसास हुआ। इस नये समीकरण को खंडित करने के लिये मीडिया के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने “माई” यानि मुस्लिम और यादव की संज्ञा दी। पहले तो लालू प्रसाद ने इस परिभाषा को गलत साबित करने में सफ़लता पायी और वर्ष 1995 में भारी जीत हासिल की।
इससे पहले कि लालू अपने सामाजिक न्याय की परिभाषा को और अत्याधिक व्यापक और प्रभावी बना पाते, ये चारा घोटाले के मामले में फ़ंस गये और नतीजा यह हुआ कि जो व्यक्ति सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत बनाने के लिये “भूरा बाल साफ़ करो” का नारा दिया करता था, उसने भूमिहारों और अन्य सवर्ण जातियों के साथ समझौता करना शुरु किया। अखिलेश सिंह जैसे लोग उस समय से इनके साथ हैं। इसका बहुत प्रभाव पड़ा। प्रभाव यह हुआ कि लालू के समर्थन में भूमिहार तो नहीं आये, लेकिन वे जातियां जो सवर्णों के खिलाफ़ के आंदोलन में इनके साथ थे, दूर होती गईं। मीडिया ने अपना रुप दिखाना शुरु कर दिया था।
वर्ष 2000 का समय वह समय था जो लालू प्रसाद के लिये एक चेतावनी लेकर आया और वर्ष 1995 के चुनाव में रिकार्डतोड़ जनादेश पाने वाले लालू को बहुमत के लिये तरसना पड़ा। लेकिन दस साल के सत्ता ने लालू को सत्ता का लोभी बना दिया था। इन्होंने उस कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया, जिसका वे विरोध करते थे। धीरे-धीरे स्थितियां विषम होती गईं और अति पिछड़ा एवं दलितों के मतों में बिखराव होना शुरु हुआ।
अब इससे पहले कि हम आपको आगे की सच्चाई बतायें, हम बात करते हैं नीतीश कुमार के अभ्युदय की। पाठकों को याद होगा कि जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद से अलग हुए थे तब इन्होंने अपने सहयोगी को परास्त करने के लिये अनेक पापड़ बेले। इसमें शामिल था भाकपा(माले) जैसी पार्टियों के साथ हाथ मिलाना। पाठकों को हम यह भी बतायें कि उस समय इसी माले को लोग “6 ईंच छोटा करने वाली” पार्टी मानते थे। इसके बाद नीतीश कुमार के एक सहयोगी ने अपना कद बढाने के लिये वर्ष 1994 में कुर्मी महारैली का आयोजन किया था। इस महारैली में एक संबोधक के रुप में आये नीतीश कुमार ने स्व्यं को कुर्मी का नेता के रुप में स्थापित करने में सफ़लता हासिल की। लेकिन जब वर्ष 1995 में केवल कुर्मी वोटों से काम नहीं चला तब इस शख्स ने सवर्णों का साथ स्वीकार किया। बताते चलें कि वर्ष 1996 तक नीतीश कुमार भी सामाजिक न्याय की ही राजनीति करते थे। बाद में भाजपा के साथ गठजोड़ कर नीतीश ने एक रिस्क लिया। रिस्क था मुसलमानों के नाराज होने का। लेकिन उस समय तक बिहार की राजनीति में लालू यादव का सितारा बुलंदी पर था। लेकिन इसी स्वर्ण प्रेम ने वर्ष 2000 के चुनाव में नीतीश कुमार को प्रत्यक्ष लाभ तो नहीं दिया, लेकिन इनके कारण पहली बार सामाजिक न्याय का मिथक टूटा और भाजपा को अच्छी सीटें मिलीं। इससे सवर्ण समाज उत्साहित हुआ। सवर्ण नेताओं ने सोचा कि यह नीतीश कुमार लालू प्रसाद का विकल्प बन सकता है। यही हुआ बिहार की राजनीति में। वर्ष 2005 आते-आते लालू यादव सत्ता के गलियारे से दूर हो गये और उनकी जगह पर स्व्यं बैठने के बदले एक बार फ़िर सवर्णों ने नीतीश कुमार को बैठने का अवसर प्रदान किया। एक बार सत्ता मिलने के बाद नीतीश कुमार ने सबसे अधिक आक्रमण लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय के किले पर की। पसमांदा मुसलमानों के अंदर एक पृथक पहचान स्थापित करने की तमन्ना जगाई। दलितों के वोटों को तोड़ने के लिये संविधान को दरकिनार करते हुए महादलित आयोग का गठन किया। अति पिछड़ों को खुश करने के लिये कई जातियों को इधर-उधर किया यानि उन्हें आरक्षण की श्रेणी में ला खड़ा किया। इस बीच नीतीश ने कास्मेटिक डेवलपमेंट भी किया, जो लालू के समय में होता तो था लेकिन दिखता नहीं था। जाहिर तौर पर इसमें सबसे अधिक भूमिका मीडिया की रही।
युवा पीढी पर कोई पागलपन सवार नहीं है
जी हां दोस्तों, आज की युवा पीढी को पागलपन का दौरा नहीं पड़ता है। हम उन युवाओं की बात नहीं कर रहे हैं जिनके मां-बाप अच्छी नौकरियों में हैं अथवा अच्छे व्यवसायी हैं या फ़िर वे जिनके पास विरासत के रुप में अच्छी खासी जायदाद है और उनके पिता अपना जमीन बेचकर बाहर पढने के लिये भेजते हैं। हम बात कर रहे हैं उस युवा की जो सामाजिक न्याय की परिधि में आने वाले परिवार का हिस्सा है। उसने जब अपनी आंखें खोलीं तो देखा कि बिहार में जातीय हिंसा हो रही है। कत्लेआम मचा है। वह इस बात को समझने के काबिल नहीं था कि रणवीर सेना का गठन सवर्णों ने किसलिये किया था या फ़िर सवर्णों ने नक्सली संगठनों का निर्माण क्यों किया था। इन सबके पीछे एक मात्र कारण था कि राज्य में भूमि सुधार की समस्या की ओर कोई भी आंख उठाकर नहीं देखे। आज के युवा उस समय इस काबिल भी नहीं थे कि वे समझ सकते कि ब्थानी टोला में दलितों की हत्या क्यों की गई? लेकिन बचपन में खून से लथपथ अखबारों के पन्नों पर मुद्रित जंगलराज नामक शब्द ने इन्हें इस कदर तक भयभीत कर रखा है कि आज लालू प्रसाद उनके हक की बात करते हैं तो उन्हें लगता है कि कहीं फ़िर से जंगलराज न आ जाये।
इस कारण आज जो परिणाम नीतीश कुमार के पक्ष में आये हैं, उसमें इन युवाओं की भूमिका है। इसका एक कारण यह भी है कि कर्ज के पैसे से ही सही नीतीश कुमार ने इन्हें अल्प समय के लिये रोजगार दिया है। अब इसे आज की महंगाई के दौर में मजाक ही कहा जायेगा कि आज एक शिक्षा मित्र को स्कूल में पढाने के लिये 4 से 5 हजार रुपये महावार मिलते हैं, जबकि उसी विद्यालय में एक सरकारी शिक्षक का वेतन 30000 रुपये के ऊपर है। लेकिन बेरोजगार युवाओं ने अनुबंध की नौकरी को ही स्वीकार कर लिया और आज नीतीश के समर्थन में खड़े हैं। ये भूल रहे हैं कि कर्ज के पैसे से नीतीश कुमार उन्हें अधिक दिन तक ये पैसे नहीं दे सकते और फ़िर कल जब इनके ऊपर जिम्मेवारियां बढेंगी तो निस्संदेह इनका खर्चा बढेगा। जब इनका खर्चा बढेगा तब जाहिर तौर पर अनुबंध पर काम करने वाले ये युवा आने वाले वक्त में अपने लिये फ़ुल टाइम रोजगार मांगेंगे और रोजगार मांगने पर इन्हें डाकबंगला चौराहे पर लाठियों से पीटा जायेगा। यह दृश्य बिहार की जनता अपने आंखों से देख चुकी है।
चिर स्थायी नहीं है नीतीश की सफ़लता और अभी नहीं खत्म नहीं हुए हैं लालू, बशर्ते
सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में नीतीश कुमार युवाओं की बढती फ़ौज को फ़ुल टाइम रोजगार उपलब्ध करा पाने में सफ़ल होंगे ? इसका एक कारण यह भी है कि आने वाले समय में विकास का यही असली पैमाना बनेगा। जब सड़कें बन जायेंगी तो नीतीश कुमार के पास कास्मेटिक डेवलपमेंट के लिये कुछ भी नहीं बचेगा। इस लिहाज से आने वाला पांच साल नीतीश कुमार के लिये अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण रहेगा। यदि ये युवाओं के आशाओं पर खरे नहीं उतरे तो इनकी हालत ऐसी होगी कि इन्हें विधानसभा का मुंह देखने के लिये तरसना होगा। इस कारण अभी से यह कहना कि लालू प्रसाद की राजनीतिक मौत हो चुकी है, जल्दबाजी होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि 63-65 साल की आयु को पार कर चुके लालू प्रसाद में क्या अब भी वह संघर्ष का क्षमता शेष है जो कभी उनके गुरु जयप्रकाश में हुआ करता था। जाहिर तौर पर इसके लिये लालू को अपने घर के दरवाजे युवाओं के लिये खोलने होंगे ताकि युवा नीतीश कुमार के झुठे मायाजाल को काट सकें। यदि ऐसा नहीं होता है तो निश्चित तौर पर आने वाला समय लालू प्रसाद के लिये पोलिटिकल डेथ सरीखा होगा और इन्हें भगवान भी नहीं बचा सकेगा। रही बात नीतीश कुमार के झुठ की तो उसकी पोल तो इनके इसी कार्यकाल में खुल जायेगी। बस देखते जाइये, आगे-आगे होता है क्या? Read more on www.apnabihar.org
talash
Wednesday, November 24, 2010
नीतीश की जीत का एक मायने यह भी
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